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Sunday, October 3, 2010

आत्मा और परमात्मा

आत्मा और परमात्मा में  अंतर जानने से पहले हम उन के मूल स्वरुप को देखे और प्रकति क्या है ये देखे 
                                                          परमात्मा 
 परमात्मा की धारणा के बारे में मैंने अपनी पिछली पोस्ट में बताया था . जो निम्न है 
(१)  इश्वर  अज्ञात है. 
अगर हम कोई भी चीज जानते है तो उस का आकार निर्धारित हो जाता है .जिसका  आकार है वो न तो निराकार है और न ही अनन्त .
(२) ईश्वर एक है  अर्थात निर्विकल्प  है .
                  इस श्रष्टि का निर्माण केवल एक ही चीज करती है पर अपने दो अलग -अलग रूपों में 
                       शिव (प्रदार्थ ) और शक्ति (ऊर्जा )
                             आईन्सटीन का सूत्र इस की पुष्टि करता है
(३)ईश्वर निर्गुण है 
                           जो न न्याय करता है और न ही किसी को दंड देता है .वो कोई भी कर्म नही करता है 
(४) जो निर्गुण तो है पर उस में ज्ञान है 
                                               यदि उस में ज्ञान शक्ति न होती  तो   वो इच्छा ही न करता की  मैं एक से अनेक  हो जाऊ  और हम अपने मूल स्वरुप पाने के लिए  प्रयास न कर रहे होते .
                                                                  आत्मा 
बहुत से लोग आत्मा और जीव में  अंतर नही जानते और जीव को हो आत्मा समझते है यही कारण है की वे आत्मा को अनन्त और अजन्मा नही मानते है .
परमात्मा जी ने इच्छा की मैं एक से अनेक होजाऊ .और उन्हों आकाश (तत्व )बनाया .यह तत्व ईश्वर के सबसे निकटवर्ती है .इसी लिए जब यह तत्व शरीर में चल रहा हो तो ध्यान और योग अधिक फलदाई होता है .
फिर उन्हों ने  वायु तत्व बनाया .
वायु की घर्षण से अग्नि (तत्व ) प्रकट   हुई .
अग्नि से जल तत्व आया . इस बात को हम  वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा समझ सकते है .
एक बीकर में हाईड्रोजन ले और दूसरे बीकर में आक्सीजन दोनों को एक नली से जोड़ कर  जैसे  ही स्पार्क करेंगे  हईड्रोजन के दो परमाणु  और आक्सीजन का एक परमाणु  मिल कर  जल का निर्माण कर देते है .
सब से बाद में प्रथ्वी तत्व का निर्माण किया .
इन तत्वों से श्रष्टि निर्माण करने के बाद भी जो कुछ भी था सब निर्जीव था .अर्थात इतना सब करने के बाद भी वह अकेला ही था .
फिर उस ने अपने को अंश में विभाजित किया और  पाच तत्वों से सूछ्म देह (प्रदार्थ ) बना कर  प्रदार्थ से सैयोग  किया .इस के बाद इस सूछ्म प्रदार्थ ने स्थूल प्रदार्थ से सैयोग कर के जीवन और म्रत्यु चक्र की सुरुआत की .
वह अंश आत्मा के नाम से और वह सुछम  देह जीव के नाम से जानी जाती है . 
                                                      अतः 
(१) जिस पर दया ,छमा  प्रेम ,घ्रणा आदि गुण प्रतिबिंबित होते है वह आत्मा है .
(२)जो बुद्धि और मन नही है पर उन को संचालित करती है 
(३)  जो ज्ञान स्वरुप है
 (४)जिस में ईश्वर के सारे गुण है .क्यों की वह ईश्वर का अंश  है
                                          राम और कृष्ण की पूजा क्यों ?
वैसे पिछली पोस्ट में मैं इस  की  चर्चा कर के अपना द्रष्टिकोण रख चुका हू पर मैं अपनी बात सरल शब्दों में कहना चाहूँगा .
राम कृष्ण की पूजा का ये अर्थ कदापि नही है की वो प्रकट हो कर हमें आशीर्वाद देंगे और हम तर जायेंगे .
'अहम् ब्रहस्मी '  का बोध  ही ईश्वरत्व की प्राप्ति है .इस का बोध होने के बाद  आगे का रास्ता तय करने के लिए किसी की जरुरत नही होती .ये आगे का रास्ता तय करते हुए अपने से कम चेतना स्तर को ईश्वरत्व का बोध करा देते है (पिछली पोस्ट देखे )
जितने भी है या कभी हुए उन सब  में मैं ही था .राम भी मैं ही था और कृष्ण भी मैं .इस पोस्ट का लेखक भी मैं हू आप के रूप में पाठक भी मैं ही हू .
हम सब जीव तो अलग अलग है पर हम सब की आत्मा एक ही है .
यदि हम अपने राम या कृष्ण रूप का ध्यान करेंगे तो हम अपने इसी रूप को प्राप्त हो जायेंगे 


 


 .

 

6 comments:

ZEAL said...

.

यदि हम अपने राम या कृष्ण रूप का ध्यान करेंगे तो हम अपने इसी रूप को प्राप्त हो जायेंगे ...

सहमत हूँ आपकी बात से , क्यूंकि ऐसा ही कुछ अनुभव है मेरा।

सुन्दर आलेख।
आभार।

.

Ejaz Ul Haq said...

India has Changed - आ गया है बदलने का वक्त पढ़ने के लिए आप सभी सादर Invite हैं मेरे चिट्ठे पर

Ejaz Ul Haq said...

राम जन्म भूमि की तरह मंदिर क्यों न बनाया राम मरण भूमि पर ?

(३)
महापुरुष जहाँ आपने प्राण त्यागते हैं उस जगह स्मारक बनाने की परम्परा
दुनिया के हर देश में पाई जाती है , भारत में भी है लेकिन राम जन्म भूमि पर
मंदिर बनाने के लिए खून बहाने वालों ने राम मरण भूमि पर मंदिर बनाना ज़रूरी नहीं समझा जोकि बिलकुल आसान है, यदि वे ऐसा करते तो दुनिया को पता
चल जाता की राम राज्य का अंत करने वाले और भारत की तबाही के असली
ज़िम्मेदार सदा से कौन हैं ?

पाक टेंशन का जन्म और उससे मुक्ति का उपाय

(४)
नेहरु जिन्नाह टेंशन हिन्दू मुस्लिम टेंशन में बदल गयी. नेहरु भी आर्य था
और जिन्नाह भी आर्य था , नेहरु का साथ देने वाले भी आर्य थे जो जिन्नाह के
साथ खड़े थे वे भी आर्य थे, बटवारे के लिए आर्य पहले भी महाभारत लड़े थे और
उनके वारिस, अब फिर आमने सामने खड़े थे, अब न नेहरु है न जिन्नाह है, लेकिन
हिंद पाक टेंशन फिर भी ज़िन्दा है जब तक नफ़रत रहेगी पाक टेंशन भी रहेगी
नफ़रत मिटाओ हाथ मिलाओ बिखरे टुकड़े साथ मिलाओ युक्ति कोई एसी बताओ, आपके
पास न हो तो हम से ले जाओ, सारांश यह कि बात को घटाओ कोई ग़लती हो तो हमें
समझाओ

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

Gyaanbardhak post...........
Congrats.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

एजाज-उल-हक आप लोगों का अवश्य बनना चाहिये ...

satyender said...

hum sabhi ek hi aatma k sawrup h....na to hamara janam hua h or na mrityu...hum ajanme h..kyu ki sabhi aatmaye usi ishwar ka sawrup h...na mai hindu hu, na mai muslim hu, na mai, christian hu or na mai bodh, na mai jain hu. ye sab to insaan ne un dharmatamao k naam pe rakh liye jinhone ishwar ne hi bheja tha...aatma k rup me..par koi kha janma koi kha...
muslim dharam ki sathapna me batate h ki niyam or sayam par raho..
christ pyar ka rasta batlake gaye..
guru nanak sahab ne shakti ko bataya .....to wo messanger the jab hum apni in sabhi qualities ko bhul rahe the....par ab to hum bhul hi chuke h ki hum aatmaye h or yha natak k liye aaye h...har dharam me btaya h ki hum yha k nhi humara ghar upar h..to phir naswar sansar k liye jaghda kyu...us parmatma ko yaad karo jiski hum nur h.....aaj sab kahte h hum to us nur ae ilahi ki santan h..par us nur se hi dur hote ja rahe..hum sab b to us nur ka part h...to jab is nur sawrup ko pahchanoge..tabhi asli nur ko pahchanoge....wo nirakar h..na wo hindu h na wo muslim h na wo chist h..wo to jisne jaisa dekho bol diya unko.....hum sab aatmya hor ek dusre ko in sab chijo bahar nikalkar dekho to sab se pyar ho jayega,,,,,,or phir allah b humse pyar karega