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Sunday, December 12, 2010

पुनर्जन्म

बहुत से लोग पुनर्जन्म   की धारणा पर विश्वास  नही करते  क्यों के वे प्रमाण मांगते है और वैज्ञानिक सोच भी प्रमाण पर ही  आधारित  है  . ऐसे बहुत से उद्दहरण पुनर्जन्म के है जिस का  का विज्ञानं के पास कोई जवाब नही है .
हम बहुत की चीजे नही जानते बल्कि बहुत ही कम जानते है ज्ञान के विशाल सागर की तुलना में , पर जिसे हम नही जानते उस का अस्तित्व है और हमारे जानने या न जानने से सत्य पर फर्क नही पड़ता  सिर्फ हम पर ही फर्क पड़ता है .
हम कार्य कारण की की अनन्त श्रंखला में है  और जिस के कारण हम को कर्मो के फल का भोग करना ही पड़ता है .यह श्रंखला स्वचालित है और पुनर्जन्म इसी  कारण होता है . यदि ऐसा न हो तो हम कर्म कर उस के फल भोगने के लिए बाध्ह्य न होते .
पुनर्जन्म इस स्वचालित प्रकति का एक हिस्सा है  .
पुनर्जन्म की प्रक्रिया समझने से पहले हमें  जीव क्या है जानना होगा .
म्रत्यु के साथ हमारा अस्तित्व समाप्त नही होता है क्यों की  म्रत्यु सिर्फ शरीर का जीव से अलग होना  है . जब तक जीव है तब  तक उस का अस्तित्व है . 
                                 जीव क्या है ?
आत्मा और जीव में अंतर है . हमारे तीन शरीर माने गए है  स्थूल , कारण और सूक्ष्म ,  स्थूल शरीर के नष्ट होने को हम म्रत्यु  और सूक्ष्म शरीर के नष्ट होने को हम मोक्ष कहते है . मोक्ष मिलने का अर्थ है हमारे अस्तित्व  का  समाप्त हो जाना  और  शून्य में  विलीन  जाना . 
कभी  बहती हुए नदी में बनते हुए जल भवर को देखिये . उस का अस्तित्व है क्यों हम उस को देख रहे है पर उस में हर पल नई जल धार आ  जाती है . तो क्या उस का अस्तित्व ये जलराशि है कदापि नही क्यों की वह तो प्रति पल बदल रही है . उस का अस्तित्व है वह  गतिज ऊर्जा  जो पुरानी जल राशी नयी को दे देती है .
ठीक यही बात हम पर लागु  होती है . हमारा शरीर  उस जल रही की तरह है तो जीव रूपी ऊर्जा के निकल जाने पर बिखर जाता है .
इस ऊर्जा को हम मन  के  नाम से जानते  है. इस को आप आम बोल चल की भाषा में प्रयोग होने वाला मत समझे . यहाँ  पर ये व्यापक अर्थ  में प्रयोग हुआ है . इस में ही हमारे जन्म जन्मान्तरो के संस्कार संचित होते है और यही हमारे अस्तित्व के लिए उत्तरदाई है .  
 क्यों की हम ईश्वर के अंश है और ये श्रष्टि इश्वर की ईच्क्षा  मात्र  से हुई . अतः हम जो भी चाहते है  वो हमें मिलता जरुर है और यही  हमारे अगले जन्म का  कारण बनता है . 
पुनर्जनम  की निश्चित प्रक्रिया होती है जिस में व्यवधान ही पड़ने पर  कुछ  समय के लिए  प्रेत योनी  प्राप्त हो सकती है .  अगली पोस्ट में  पुनर्जन्म  प्रक्रिया और प्रेत योनी के बारे में  जानकारी साझा करेंगे

12 comments:

DR. PAWAN K MISHRA said...

bahut badhiya post agle ka intzar

JC said...

बहुत बढ़िया प्रयास है!
अभिषेक जी, माफ़ करना, सत्य यह है कि किसी व्यक्ति विशेष के मन में किसी भी विषय पर एक तस्वीर अनुभव, प्रशिक्षण आदि पर निर्भर कर बनी होती है और उसके अनुसार ही वो उसको शब्द देने का प्रयास करता है,,,और क्यूंकि ब्लॉग में शब्द लिखित होते हैं, इस कारण शंका का समाधान तुरंत संभव नहीं हो पाता है जो आमने सामने बैठे होने पर शायद संभव होता...

संक्षेप में यदि में कहूं तो हर व्यक्ति एक माध्यम अथवा यन्त्र है जिसमें पंचभूत को प्रतिबिंबित करती पांच इन्द्रियों के माध्यम से मेरे मस्तक के भीतर रखे मस्तिष्क-रुपी यन्त्र में वर्तमान (कलियुग) में हुई गतिविधि दिखाई पड़ती है और जिसका विश्लेषण कर मेरे, एक दृष्टा मात्र के, सामने प्रस्तुत कर दिया जाता है...और उसके आधार पर, मेरी अपनी विभिन्न इन्द्रियों की कार्य-क्षमता के अनुसार मैं कुछ धारणा बना लेता हूँ, भले ही वो अन्य व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की उसी विषय पर धारणा अथवा धारणाओं से भिन्न क्यों न हो,,,जैसा आम तौर पर देखने को मिलता भी है, क्यूंकि मानव भी निरंतर परिवर्तनशील प्रकृति का ही एक अंश है...इस लिए मैं यदि किसी एक यन्त्र का उपयोग करता हूँ तो मैं जानता हूँ कि मैं उससे क्या उपेक्षा रखता हूँ, और यदि वो मेरे उद्देश्य को पूरा करने में समर्थ नहीं होता है तो मैं उसे फ़ेंक कोई उससे बढ़िया यन्त्र ढूंढता हूँ...शायद ऐसा ही असली दृष्टा, प्रकृति का रचियता, भी करता हो (?)...जैसे में किसी यन्त्र का आविष्कार और उपयोग किसी उद्देश्य से करता हूँ उसी प्रकार शायद जानना आवश्यक हो कि वो क्या चाहता है (?)...इतना तो साफ़ है कि मानव एक अद्भुत यन्त्र है!

abhishek1502 said...

@jc जी ,
आप ठीक कह रहे है .

JC said...

जैसा सभी को पता है, प्रकृति परिवर्तनशील होने के कारण उसमें समय (काल जो अनंत है) के साथ बदलाव आना प्राकृतिक है…

और यदि कोई यह जान ले, और मान भी ले, कि वह केवल 'माटी का पुतला' है, एक मानव द्वारा बनाई गयी अस्थायी मशीन समान ही है, किन्तु उससे रचना में बहुत श्रेष्ट क्यूंकि कोई निराकार परम ज्ञानी और परम शक्ति शाली जीव इस संसार में किसी विशेष उद्देश्य से, सीमित काल के लिए ला, निज स्वार्थ में कह लो, उपयोग में ला रहा है,,, भले ही 'अज्ञानतावश', यानि सम्पूर्ण ज्ञान के आभाव में, ऐसा क्यूँ न प्रतीत होता हो कि उसका 'दुरूपयोग', कोई उससे भी निम्नतर श्रेणी का जीव कर रहा है,,, तो जैसा प्राचीन ज्ञानी भी कह गए कि मानव ब्रह्माण्ड का प्रतिरूप अथवा प्रतिबिम्ब है, इस विश्वास के साथ कि यद्यपि सभी अनंत जीव उसी परमात्मा से जुड़े हैं और उसी के इशारे पर काम कर रहे हैं, तो शायद इसी में भला हो कि हर व्यक्ति सर्वप्रथम प्रभु पर पूर्ण विश्वास करे, यानि एक अनंत और सर्वगुणसंपन्न जीव पर जो साकार संसार के अस्तित्व में आने से पहले भी 'आकाश' में 'अग्नि रूप’; निराकार नादबिन्दू यानि ऊर्जा के रूप में विद्यमान था और जिसने रचना में ध्वनि ऊर्जा (ब्रह्मनाद) का उपयोग किया (जिस कारण मन्त्र आदि की उपयोगिता),,, और जितना संभव हो गहराई में जाने के साथ-साथ आत्म-समर्पण कर प्रभु की लीला का, (गीतानुसार) स्तिथप्रज्ञ हो, आनंद ले, जैसे संकेत मिलते हैं प्राचीन काल में ज्योतिषी अदि भी 'विज्ञान' के आधार पर किये,,, हमारे सौर-मंडल के सदस्यों और मनुष्य की कार्य प्रणाली को भी एक समान जान ("यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे" जिसे आधुनिक वैज्ञानिक भी दुहराते हैं)...

JC said...

जैसा सभी को पता है, प्रकृति परिवर्तनशील होने के कारण उसमें समय (काल जो अनंत है) के साथ बदलाव आना प्राकृतिक है…

और यदि कोई यह जान ले, और मान भी ले, कि वह केवल 'माटी का पुतला' है, एक मानव द्वारा बनाई गयी अस्थायी मशीन समान ही है, किन्तु उससे रचना में बहुत श्रेष्ट क्यूंकि कोई निराकार परम ज्ञानी और परम शक्ति शाली जीव इस संसार में किसी विशेष उद्देश्य से, सीमित काल के लिए ला, निज स्वार्थ में कह लो, उपयोग में ला रहा है,,, भले ही 'अज्ञानतावश', यानि सम्पूर्ण ज्ञान के आभाव में, ऐसा क्यूँ न प्रतीत होता हो कि उसका 'दुरूपयोग', कोई उससे भी निम्नतर श्रेणी का जीव कर रहा है,,, तो जैसा प्राचीन ज्ञानी भी कह गए कि मानव ब्रह्माण्ड का प्रतिरूप अथवा प्रतिबिम्ब है, इस विश्वास के साथ कि यद्यपि सभी अनंत जीव उसी परमात्मा से जुड़े हैं और उसी के इशारे पर काम कर रहे हैं, तो शायद इसी में भला हो कि हर व्यक्ति सर्वप्रथम प्रभु पर पूर्ण विश्वास करे, यानि एक अनंत और सर्वगुणसंपन्न जीव पर जो साकार संसार के अस्तित्व में आने से पहले भी 'आकाश' में 'अग्नि रूप’; निराकार नादबिन्दू यानि ऊर्जा के रूप में विद्यमान था और जिसने रचना में ध्वनि ऊर्जा (ब्रह्मनाद) का उपयोग किया (जिस कारण मन्त्र आदि की उपयोगिता),,, और जितना संभव हो गहराई में जाने के साथ-साथ आत्म-समर्पण कर प्रभु की लीला का, (गीतानुसार) स्तिथप्रज्ञ हो, आनंद ले, जैसे संकेत मिलते हैं प्राचीन काल में ज्योतिषी अदि भी 'विज्ञान' के आधार पर किये,,, हमारे सौर-मंडल के सदस्यों और मनुष्य की कार्य प्रणाली को भी एक समान जान ("यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे" जिसे आधुनिक वैज्ञानिक भी दुहराते हैं)...

JC said...

जैसा सभी को पता है, प्रकृति परिवर्तनशील होने के कारण उसमें समय (काल जो अनंत है) के साथ बदलाव आना प्राकृतिक है…

और यदि कोई यह जान ले, और मान भी ले, कि वह केवल 'माटी का पुतला' है, एक मानव द्वारा बनाई गयी अस्थायी मशीन समान ही है, किन्तु उससे रचना में बहुत श्रेष्ट क्यूंकि कोई निराकार परम ज्ञानी और परम शक्ति शाली जीव इस संसार में किसी विशेष उद्देश्य से, सीमित काल के लिए ला, निज स्वार्थ में कह लो, उपयोग में ला रहा है,,, भले ही 'अज्ञानतावश', यानि सम्पूर्ण ज्ञान के आभाव में, ऐसा क्यूँ न प्रतीत होता हो कि उसका 'दुरूपयोग', कोई उससे भी निम्नतर श्रेणी का जीव कर रहा है,,, तो जैसा प्राचीन ज्ञानी भी कह गए कि मानव ब्रह्माण्ड का प्रतिरूप अथवा प्रतिबिम्ब है, इस विश्वास के साथ कि यद्यपि सभी अनंत जीव उसी परमात्मा से जुड़े हैं और उसी के इशारे पर काम कर रहे हैं, तो शायद इसी में भला हो कि हर व्यक्ति सर्वप्रथम प्रभु पर पूर्ण विश्वास करे, यानि एक अनंत और सर्वगुणसंपन्न जीव पर जो साकार संसार के अस्तित्व में आने से पहले भी 'आकाश' में 'अग्नि रूप’; निराकार नादबिन्दू यानि ऊर्जा के रूप में विद्यमान था और जिसने रचना में ध्वनि ऊर्जा (ब्रह्मनाद) का उपयोग किया (जिस कारण मन्त्र आदि की उपयोगिता),,, और जितना संभव हो गहराई में जाने के साथ-साथ आत्म-समर्पण कर प्रभु की लीला का, (गीतानुसार) स्तिथप्रज्ञ हो, आनंद ले, जैसे संकेत मिलते हैं प्राचीन काल में ज्योतिषी अदि भी 'विज्ञान' के आधार पर किये,,, हमारे सौर-मंडल के सदस्यों और मनुष्य की कार्य प्रणाली को भी एक समान जान ("यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे" जिसे आधुनिक वैज्ञानिक भी दुहराते हैं)...

JC said...

प्राचीन ज्ञानी भी कह गए कि मानव ब्रह्माण्ड का प्रतिरूप अथवा प्रतिबिम्ब है, इस विश्वास के साथ कि यद्यपि सभी अनंत जीव उसी परमात्मा से जुड़े हैं और उसी के इशारे पर काम कर रहे हैं, तो शायद इसी में भला हो कि हर व्यक्ति सर्वप्रथम प्रभु पर पूर्ण विश्वास करे, यानि एक अनंत और सर्वगुणसंपन्न जीव पर जो साकार संसार के अस्तित्व में आने से पहले भी 'आकाश' में 'अग्नि रूप’; निराकार नादबिन्दू यानि ऊर्जा के रूप में विद्यमान था और जिसने रचना में ध्वनि ऊर्जा (ब्रह्मनाद) का उपयोग किया (जिस कारण मन्त्र आदि की उपयोगिता),,, और जितना संभव हो गहराई में जाने के साथ-साथ आत्म-समर्पण कर प्रभु की लीला का, (गीतानुसार) स्तिथप्रज्ञ हो, आनंद ले, जैसे संकेत मिलते हैं प्राचीन काल में ज्योतिषी अदि भी 'विज्ञान' के आधार पर किये,,, हमारे सौर-मंडल के सदस्यों और मनुष्य की कार्य प्रणाली को भी एक समान जान ("यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे" जिसे आधुनिक वैज्ञानिक भी दुहराते हैं)...

Manoj Kumar Singh 'Mayank' said...

भैया अभिषेक जी
पेशे से अलग हटकर आपका धर्म सम्बन्धी ज्ञान अद्वितीय है| मैं आज पहली बार आपका पोस्ट पढ़ रहा हूँ और पढते ही आपका मुरीद हो गया | आपका आभार

JC said...

पहले तो टिप्पणी स्वीकार नहीं कर रहा था, छोटा करने पर स्वीकार हुआ किन्तु सभी प्रकाशित हो गयीं! यही अंतर है मानव मस्तिष्क में और उसके द्वारा बनाये गए उपकरणों, कंप्यूटर आदि में, जिनका सही उपयोग करने के लिए विक्रेता पुस्तिका भी साथ देता है,,,जबकि मानव जन्म के साथ कोई पुस्तिका उपलब्ध नहीं कराता (परमेश्वर?) और जिस कारण हर व्यक्ति ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी को मंझधार में फ़ेंक दिया जाए और वो यदि जीवित रहना चाहे तो उसके लिए हाथ पैर मार के तैरना सीखना आवश्यक होता है,,, किन्तु बढ़िया स्वर्ण पदक विजयी तैराक बनने के लिए प्रशिक्षण के अतिरिक्त सतत अभ्यास आदि आवश्यक है!

abhishek1502 said...

मयंक जी , मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आप का बहुत बहुत आभार

ZEAL said...

पुनर्जन्म होता है अथवा नहीं , इसके प्रमाण विज्ञान के पास नहीं हैं। और संभव भी नहीं है। लेकिन अक्सर कुछ लोगों को अपने पिछले जन्म की बातें याद रहती हैं और परिक्षण करने पर उन्हें सत्य भी पाया गया है , जिससे लगता है की पुनर्जन्म होता है।

JC said...

पुनर्जन्म अथवा उससे पहले जन्म की चर्चा करें तो, आमतौर पर देखने को नहीं मिलता किन्तु किसी फिल्म में शायद हम देखें एक व्यक्ति को जिसकी किसी दुर्घटना के कारण याददास्त खो गयी हो,,,और अस्पताल में होश में आकर पूछते, "मैं कहाँ हूँ?" और फिर पुरानी बातें भूल जानें के कारण, नाम- पता न मालूम होने से, परेशान हो जाना कि वो कौन है? वो कहाँ रहता था? जहां वो लौट कर चैन पा सके आदि, आदि...शायद यही स्तिथि मानव रूप में किसी माता विशेष द्वारा जन्म ले हर व्यक्ति (शिशु, अथवा उसके भीतर विद्यमान आत्मा जो परमात्मा का ही अंश माना जाता है) की भी होती होगी जो उसके नींद में भी कभी हंसने और कभी रोने आदि के भाव से प्रदर्शित होती है (प्राचीन ज्ञानियों ने इसे कृष्ण को देवकी का बेटा होने किन्तु यशोदा द्वारा पाले जाने से दर्शाया? और मानव को अपस्मरा पुरुष, जिसकी स्मरण शक्ति नष्ट हो गयी हो कहा? और आधुनिक वैज्ञानिक भी कहता है की एक से क्रोमोजोम के विभिन्न मार्ग में चलने से एक वृक्ष बन गया और एक मानव, जिसे गीता में दर्शया गया यह कहकर कि मानव एक उल्टा पेड़ है इसकी जडें आकाश में हैं, आदि और खगोलशास्त्री ने चंद्रमा के सार को मानव के माथे में बताया...)...